“बेबस है वो जान” : बेजुबानों के दर्द को उजागर करती संवेदनशील रचना
बिलासपुर। साहित्यकार सरस्वती राजेश साहू की कविता “बेबस है वो जान” बेजुबान पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं के प्रति मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाली रचना है। कविता में कवयित्री ने उन प्राणियों की पीड़ा को शब्द दिए हैं, जो अपनी व्यथा स्वयं व्यक्त नहीं कर सकते।
रचना में जंगलों के विनाश, जीवों के अधिकारों के हनन तथा विकास के नाम पर हो रहे शोषण पर चिंता व्यक्त की गई है। कवयित्री ने सवाल उठाया है कि यदि मानव की प्रगति और विज्ञान अन्य जीवों के सम्मान और अस्तित्व की रक्षा नहीं कर पाते, तो ऐसी प्रगति का क्या औचित्य है।
कविता की पंक्तियां मानव को यह स्मरण कराती हैं कि पृथ्वी पर केवल मनुष्य का ही नहीं, बल्कि सभी जीव-जंतुओं का समान अधिकार है। बेजुबान प्राणियों के प्रति दया, करुणा और संवेदनशीलता ही सच्ची मानवता की पहचान है।
19 जून 2026 को रचित यह कविता समाज को पशु संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और जीवों के प्रति मानवीय व्यवहार अपनाने का प्रभावी संदेश देती है। चिचिरदा, बिलासपुर निवासी सरस्वती राजेश साहू की यह रचना पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है तथा जीव मात्र के प्रति करुणा का भाव जागृत करती है।












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