जीतेन्द्र वर्मा की कविता “मनखें मनके” ने दिया पर्यावरण संरक्षण और सह-अस्तित्व का संदेश

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जीतेन्द्र वर्मा की कविता “मनखें मनके” ने दिया पर्यावरण संरक्षण और सह-अस्तित्व का संदेश 

कोरबा। छत्तीसगढ़ी साहित्यकार जीतेन्द्र वर्मा ‘खैरझिटिया’ की कविता “मनखें मनके” प्रकृति, पर्यावरण और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देती है। कविता में कवि ने बताया है कि धरती पर सभी जीवों का समान अधिकार है और मनुष्य को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीना चाहिए।

कविता में वनों की कटाई, नदियों के अतिक्रमण, पशु-पक्षियों पर हो रहे अत्याचार तथा बढ़ते स्वार्थ के कारण उत्पन्न पर्यावरणीय संकट पर चिंता व्यक्त की गई है। कवि ने अपनी रचना के माध्यम से मानव समाज को चेताया है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ का परिणाम अंततः मनुष्य को ही भुगतना पड़ेगा।

कविता की पंक्ति “जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे” सह-अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश देती है। रचना पाठकों को प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति दया, करुणा एवं जिम्मेदारी का भाव अपनाने के लिए प्रेरित करती है।

उल्लेखनीय है कि जीतेन्द्र वर्मा ‘खैरझिटिया’ वर्तमान में मुकुटधर साहित्य समिति, कोरबा के कोषाध्यक्ष हैं और साहित्य के माध्यम से सामाजिक एवं पर्यावरणीय विषयों पर निरंतर लेखन कर रहे हैं। उनकी यह कविता पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जनजागरण का महत्वपूर्ण प्रयास मानी जा रही है।

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