‘बेटी मंय तोला कइसे पठोहूँ’ छत्तीसगढ़ी संवेदना का सशक्त काव्य-स्वर : डॉ. प्रमोद कुमार आदित्य
डॉ. आशा मेहर ‘किरण’ के प्रथम काव्य संग्रह की समीक्षा, 75 छंदबद्ध गीतों में बेटी, नारी जीवन और लोकसंवेदना का मार्मिक चित्रण
जांजगीर। छत्तीसगढ़ी भाषा अपने लोकगीतों, छंदों और गेय परंपरा के कारण सदैव जनमानस के हृदय से जुड़ी रही है। इसी समृद्ध परंपरा में कवयित्री डॉ. आशा मेहर ‘किरण’ का छत्तीसगढ़ी छंदबद्ध गीत संग्रह ‘बेटी मंय तोला कइसे पठोहूँ’ संवेदना, सामाजिक सरोकार और लोकजीवन की अनुभूतियों को स्वर देने वाली महत्वपूर्ण कृति के रूप में सामने आया है।
सेवानिवृत्त प्राचार्य एवं समीक्षक डॉ. प्रमोद कुमार आदित्य, जांजगीर ने पुस्तक की समीक्षा करते हुए कहा कि प्रथम कृति होने के बावजूद इसमें अनुभूति की परिपक्वता और अभिव्यक्ति की सशक्तता स्पष्ट दिखाई देती है। उनके अनुसार यह संग्रह छत्तीसगढ़ी गीत साहित्य में एक सार्थक हस्तक्षेप है।
पुस्तक के शीर्षक ‘बेटी मंय तोला कइसे पठोहूँ’ को डॉ. आदित्य ने अत्यंत मार्मिक बताया। उनके अनुसार यह केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि बेटी की विदाई, उसकी सुरक्षा और भविष्य को लेकर माता-पिता के मन में छिपी चिंता और पीड़ा का स्वर है। शीर्षक में ही पूरी कृति की संवेदना और सामाजिक यथार्थ समाहित है।
75 गीतों में जीवन के विविध रंग
संग्रह में कुल 75 गीत संकलित हैं।
इनमें बेटी और नारी जीवन की कोमल संवेदनाएं, पारिवारिक रिश्तों की आत्मीयता, ग्रामीण जीवन की सादगी, सामाजिक विसंगतियों पर प्रश्न तथा छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की सुगंध प्रमुखता से दिखाई देती है।
समीक्षक के अनुसार कवयित्री ने विषयों को आरोप या उपदेश के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उन्हें अपने अनुभव और अनुभूति से जोड़ा है। यही कारण है कि रचनाएं सहज, विश्वसनीय और पाठकों के मन के करीब बन पड़ी हैं।
लोकभाषा और छंदबद्धता बनी संग्रह की विशेषता
डॉ. आशा मेहर की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और लोकबोध से समृद्ध है। छत्तीसगढ़ी की मिठास, स्थानीय शब्दावली तथा बोलचाल की स्वाभाविकता गीतों को गेय और स्मरणीय बनाती है। छंदबद्ध रचनाओं में लय का विशेष ध्यान रखा गया है, जिससे ये गीत मंचीय प्रस्तुति के साथ-साथ पाठकीय आनंद भी प्रदान करते हैं।
स्त्री दृष्टि से उभरी करुणा और संवेदना
समीक्षा में संग्रह की महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में स्त्री दृष्टि से उपजी करुणा और संवेदना को रेखांकित किया गया है। रचनाओं में नारी को केवल पीड़िता के रूप में नहीं, बल्कि सहनशीलता और सामाजिक दिशा देने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रतिरोध का स्वर भी यहां तीखा होने के बजाय करुणा और आत्ममंथन से जुड़ा हुआ है।
डॉ. आदित्य ने बताया कि आनंद सिंघनपुरी द्वारा लिखी गई भूमिका संग्रह की भावभूमि को समझने में सहायक है। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विनय पाठक और श्री ईश्वरी यादव के शुभकामना संदेश कृति की साहित्यिक स्वीकार्यता को और मजबूत करते हैं।
छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध करने वाली कृति
समग्र रूप से डॉ. प्रमोद कुमार आदित्य ने ‘बेटी मंय तोला कइसे पठोहूँ’ को एक सशक्त, संवेदनशील और संग्रहणीय काव्य-कृति बताया। उन्होंने कहा कि प्रथम कृति होते हुए भी इसमें अनुभव की गहराई, भाषा की परिपक्वता और सामाजिक सरोकारों की स्पष्ट झलक मिलती है।
उनके अनुसार यह संग्रह छत्तीसगढ़ी गीत साहित्य को समृद्ध करने के साथ पाठकों के हृदय में मानवीय संवेदनाओं का बीज भी रोपता है। छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के प्रेमियों के लिए यह कृति निश्चित रूप से महत्वपूर्ण एवं स्मरणीय योगदान है।
— डॉ. प्रमोद कुमार आदित्य
सेवानिवृत्त प्राचार्य, जांजगीर, छत्तीसगढ़










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