जटाशंकर महादेव शिवधाम पर्वत: आस्था, और विश्वास का संगम*

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*जटाशंकर महादेव शिवधाम पर्वत: आस्था, और विश्वास का संगम 

 

छत्तीसगढ़ के राजनादगांव जिले के डोंगरगढ़ स्थति माँ बम्लेश्वरी देवी मंदिर के दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक विशाल पर्वत किंतु अत्यंत रमणीय पहाड़ी पर विराजमान जटाशंकर महादेव का पावन शिव पर्वत डोंगरगढ़ की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल प्रतीक है।

इस पहाड़ी की प्राकृतिक आकृति स्वयं शिवलिंग के समान प्रतीत होती है, जो इसे आध्यात्मिक दृष्टि से और भी विशिष्ट बनाती है। स्थानीय जनश्रुतियों एवं प्राचीन मान्यताओं के अनुसार यह क्षेत्र आदिकाल से भगवान शंभू महादेव के उपासकों की साधना एवं आराधना का प्रमुख केंद्र रहा है।

मान्यता है कि प्राचीन काल में भगवान शंभू महादेव के अनुयायी इस स्थान पर एकत्र होकर उनके द्वारा बताए गए त्रिशूल मार्ग के ज्ञान का श्रवण करते थे। यह मार्ग मानव जीवन को कल्याण, आत्मज्ञान, योगसिद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा प्रदान करने वाला माना जाता था। इसी कारण यह स्थल सदियों से श्रद्धा, तप, साधना और लोकआस्था का केंद्र बना हुआ है।

पहाड़ी के शिखर पर लगभग पाँच हजार श्रद्धालुओं के एक साथ बैठने योग्य विशाल प्राकृतिक मैदान स्थित है। मंदिर परिसर के चारों ओर फैली प्राकृतिक छटा, शांत वातावरण और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रत्येक आगंतुक को दिव्यता का अनुभव कराती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति ने स्वयं इस स्थान को भगवान शिव की तपोभूमि के रूप में सहेजकर रखा हो।

स्थानीय इतिहास में स्वर्गीय श्री भगोलीराम जी का विशेष उल्लेख मिलता है। वे आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के ज्ञाता थे और बम्लेश्वरी पहाड़ी के आसपास दुर्लभ वनस्पतियों की खोज के लिए नियमित रूप से आते-जाते थे। उनका ग्राम गाजमर्रा (कल्याणपुर) से निकट संबंध था।

एक दिन उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला देवी को स्पन में भगवान शंभू महादेव के दर्शन हुए, जिसमें उन्हें पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद मिला। कुछ समय पश्चात यह स्वप्न सत्य सिद्ध हुआ। उस समय इस स्थान पर मंदिर का निर्माण नहीं हुआ था, किंतु उसी दिन से स्वर्गीय भगोलीराम जी की इस स्थल के प्रति अटूट श्रद्धा स्थापित हो गई।

वे प्रत्येक महाशिवरात्रि पर इस पवित्र स्थल में श्रीफल अर्पित कर भगवान शंभू महादेव का पूजन करते थे। उनके पश्चात भी यह धार्मिक परंपरा उनके परिवार द्वारा निरंतर निभाई जा रही है और आज भी प्रत्येक महाशिवरात्रि पर श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है।

सन 1998 में वरिष्ठ शिक्षक स्व० श्री बी. डी. दत्ता एवं अन्य साथियों ने इस ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल के संरक्षण और विकास का संकल्प लिया। ग्रामवासियों के सहयोग, समर्पण और सामूहिक प्रयास से यहां जटाशंकर महादेव मंदिर का निर्माण प्रारंभ हुआ। समय के साथ मंदिर का विकास निरंतर होता गया और आज इसके सुव्यवस्थित संचालन एवं विस्तार का दायित्व जटाशंकर मंदिर ट्रस्ट द्वारा निभाया जा रहा है।

इसके पश्चात शिक्षक दत्ता एवं साथियों ने अपितु सारे साथी बुजुर्ग हो गए थे और कुछ का देहांत हो चुका था मंदिर का बीड़ा उठाने के लिए सक्षम नहीं थे क्योंकि ऊँचे पर्वत पे शिव जी विराज मान है टी तभी सारे साथियों ने मिलकर निर्णय लिए कि अब इसका कार्यभार किसी शिव भक्त को सोपा जाये इसी क्रम में डोंगरगढ़ के बेहद ही सक्रिय सामाजिक कार्यकता एवं शिव भक्त सोन कुमार सिन्हा को कार्यभार सौंपा गया फिर क्या श्री सिन्हा के द्वारा कुछ वर्षो में श्री जटाशंकर मंदिर ट्रस्ट समिति का विधिवत पंजीयन करा कर इसे एक पब्लिक ट्रस्ट बनाया गया जिसका वर्तमान में सोन कुमार सिन्हा अध्यक्ष है और अनुविभागीय अधिकारी राजस्व इस ट्रस्ट के रजिस्टार है साथ ही ट्रस्ट संचालन के लिए 15 ट्रस्टी है कि इस मंदिर के कार्य का देख रेख ,रूप रेखा तैयार करते है और हर वर्ष इन्हीं सदस्यों के द्वारा जन सहयोग से विशाल भंडारा का भी आयोजन किया जाता है ,

महाशिवरात्रि के अवसर पर हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन एवं पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। श्रावण मास में इस क्षेत्र में नागराज के दर्शन होने की भी स्थानीय मान्यता प्रचलित है, जो श्रद्धालुओं की आस्था को और अधिक दृढ़ बनाती है

जटाशंकर महादेव केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि डोंगरगढ़ की ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक परंपरा, प्राकृतिक सौंदर्य और सनातन आस्था का जीवंत प्रतीक है। यह पवित्र स्थल आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी धार्मिक विरासत और आध्यात्मिक संस्कृति का अमूल्य धरोहर बना रहेगा।

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