नीदरलैंड्स से लौटी चोलकालीन धरोहर, ताम्रपत्रों की वापसी से देश में खुशी की लहर
भारत-नीदरलैंड्स संबंधों को मिली नई मजबूती, सांस्कृतिक विरासत की घर वापसी को बताया ऐतिहासिक क्षण
रायपुर/नई दिल्ली। नीदरलैंड्स के शाही परिवार द्वारा 11वीं सदी के चोल वंशकालीन ऐतिहासिक ताम्रपत्र भारत को लौटाए जाने के निर्णय का देशभर में स्वागत हो रहा है। इतिहासकारों, संस्कृति प्रेमियों और शोधकर्ताओं ने इसे भारत की सांस्कृतिक विरासत की पुनर्स्थापना और राष्ट्रीय गौरव से जुड़ा ऐतिहासिक कदम बताया है।
इतिहास एवं संस्कृति शोधकर्ता Dr. Chauleshwar Chandrakar ने कहा कि यह केवल प्राचीन दस्तावेजों की वापसी नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सभ्यता, संस्कृति और गौरव की पुनः प्रतिष्ठा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री Narendra Modi के नीदरलैंड्स दौरे के दौरान वहां के राजा Willem-Alexander और रानी Máxima से हुई मुलाकात में डिजिटल प्रौद्योगिकी, नवाचार और फिनटेक इकोनॉमी में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई, जो भारत-नीदरलैंड्स संबंधों को नई ऊंचाई देने वाला कदम है।
चोल वंश भारतीय इतिहास का गौरवशाली अध्याय
चोल वंश दक्षिण भारत का एक अत्यंत प्राचीन और शक्तिशाली राजवंश माना जाता है। भारतीय और विदेशी दोनों ऐतिहासिक स्रोतों में इसका उल्लेख मिलता है। महाभारत, सम्राट अशोक के अभिलेख, यूनानी दूत मेगस्थनीज के विवरण तथा चीनी यात्री Xuanzang (ह्वेनसांग) के यात्रा वृत्तांतों में भी चोल साम्राज्य की समृद्धि और प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन मिलता है।
इतिहासकारों के अनुसार विजयालय चोल ने पल्लवों की अधीनता से मुक्त होकर स्वतंत्र चोल राज्य की स्थापना की थी। इसके बाद यह साम्राज्य दक्षिण भारत की सबसे प्रभावशाली सत्ता बनकर उभरा।
राजराज प्रथम के शासन में पहुंचा उत्कर्ष पर चोल साम्राज्य
राजराज प्रथम को चोल साम्राज्य का महानतम शासक माना जाता है। उनका वास्तविक नाम अरुमोलिवर्मन था और वे परांतक द्वितीय के पुत्र थे। उनके शासनकाल में चोल साम्राज्य ने राजनीतिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक दृष्टि से अभूतपूर्व विकास किया।
उन्होंने केरल देश पर विजय प्राप्त कर साम्राज्य का विस्तार किया तथा प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया। चोल शासन राजतंत्रीय व्यवस्था पर आधारित था, लेकिन उसकी प्रशासनिक नीति व्यवस्थित और जनहितकारी मानी जाती थी।
संस्कृति, साहित्य और स्थापत्य कला का स्वर्णकाल
डॉ. चौलेश्वर चंद्राकर ने कहा कि चोल काल केवल राजनीतिक शक्ति का प्रतीक नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक और साहित्यिक विकास का स्वर्णकाल भी था। इस काल में तमिल साहित्य का व्यापक विकास हुआ और अधिकांश अभिलेख तमिल भाषा में लिखे गए।
हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों ने शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में समान योगदान दिया। उस समय मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र भी थे। चोल शासकों द्वारा निर्मित भव्य मंदिर आज भी भारतीय स्थापत्य कला की महान पहचान माने जाते हैं।
30 किलो वजनी ताम्रपत्रों का विशेष ऐतिहासिक महत्व
नीदरलैंड्स से भारत लौटाए गए लगभग 30 किलो वजनी ताम्रपत्रों में 21 बड़े और तीन छोटे प्लेटों का एक सेट शामिल है। इन पर संस्कृत और तमिल भाषाओं में महत्वपूर्ण शिलालेख अंकित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये ताम्रपत्र इतिहास शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और संस्कृति अध्येताओं के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगे।
डॉ. चौलेश्वर चंद्राकर ने कहा कि ये ताम्रपत्र केवल पुरातात्विक वस्तुएं नहीं, बल्कि भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर और प्राचीन सभ्यता का जीवंत प्रमाण हैं। उनकी घर वापसी से देशवासियों में गर्व और भावनात्मक जुड़ाव की भावना और अधिक मजबूत होगी। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत और नीदरलैंड्स के बीच बढ़ती मित्रता भविष्य में सांस्कृतिक और आर्थिक सहयोग के नए आयाम स्थापित करेगी।












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