मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक आवास योजना में 65 लाख की अनियमितता का मामला
जांच पूरी, कार्रवाई की अनुशंसा भी भेजी गई… फिर भी डेढ़ माह से फाइल अटकी
तत्कालीन जिला श्रम अधिकारी एनके साहू पर अब तक नहीं हुई कार्रवाई,
प्लेसमेंट कर्मचारी को केवल कार्यमुक्त कर मामले को दबाने के आरोप
बेमेतरा। मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक आवास सहायता योजना में कथित तौर पर लगभग 65 लाख रुपए की शासकीय राशि में अनियमितता और गबन के मामले में जांच पूरी होने तथा स्पष्ट कार्रवाई की अनुशंसा शासन को भेजे जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस विभागीय कदम नहीं उठाया गया है। इस मामले में तत्कालीन जिला श्रम अधिकारी एनके साहू की भूमिका जांच रिपोर्ट में उल्लेखित होने के बाद भी उनके विरुद्ध न तो निलंबन की कार्रवाई हुई है, न विभागीय जांच प्रारंभ हुई है और न ही किसी प्रकार की दंडात्मक कार्यवाही सामने आई है। करीब डेढ़ माह से फाइल श्रम विभाग स्तर पर लंबित बताई जा रही है, जिससे प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक आवास सहायता योजना के क्रियान्वयन में गड़बड़ी की शिकायतों के बाद जिला प्रशासन ने विस्तृत जांच कराई थी। जांच के दौरान दस्तावेजों की वैधता, हितग्राहियों की पात्रता जांच, स्वीकृति प्रक्रिया तथा लाभ वितरण में गंभीर त्रुटियां पाई गईं। साथ ही लगभग 65 लाख रुपए की शासकीय राशि के उपयोग और वितरण में अनियमितता के तथ्य सामने आए।
जांच प्रतिवेदन के आधार पर कलेक्टर के निर्देश पर अतिरिक्त कलेक्टर, बेमेतरा ने दिसंबर माह में श्रम विभाग के सचिव को विस्तृत पत्र प्रेषित कर तत्कालीन जिला श्रम अधिकारी एनके साहू के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई—निलंबन, रिकवरी और एफआईआर दर्ज करने—की अनुशंसा की थी। जांच और अनुशंसा से संबंधित दस्तावेज प्राप्त हुआ हैं और मामला शासन स्तर तक पहुंच चुका है।
=स्थानांतरण के बाद भी कार्रवाई लंबित
जानकारी के अनुसार एनके साहू वर्तमान में धमतरी जिले में पदस्थ हैं। हालांकि प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि स्थानांतरण किसी अधिकारी को जांच या दंडात्मक प्रक्रिया से मुक्त नहीं करता। यदि जांच में भूमिका संदिग्ध पाई गई है तो विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। इसके बावजूद अब तक किसी प्रकार की ठोस प्रगति न होना विभागीय कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
=प्लेसमेंट कर्मचारी पर भी नहीं हुई कानूनी कार्रवाई
मामले में संलिप्त बताए जा रहे एक प्लेसमेंट कर्मचारी को केवल कार्यमुक्त किए जाने की जानकारी मिली है। लेकिन उनके विरुद्ध भी न तो आपराधिक प्रकरण दर्ज हुआ है और न ही किसी वैधानिक कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि हुई है। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं पूरे प्रकरण को धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में तो नहीं डाला जा रहा।
=जनप्रतिनिधियों ने उठाए सवाल
इस मामले की शिकायतकर्ता स्थानीय भाजपा पार्षद नीतू कोठारी ने सवाल उठाते हुए कहा कि जब जांच पूरी हो चुकी है और जिला प्रशासन ने स्पष्ट रूप से कार्रवाई की अनुशंसा कर दी है, तो फिर देरी किस कारण से हो रही है? उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं में अनियमितता के मामलों में त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई आवश्यक है, अन्यथा जनता के बीच यह संदेश जाता है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई करना कठिन है।
=पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्न
विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक आवास सहायता योजना जैसी योजनाएं श्रमिक वर्ग को आवासीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से संचालित होती हैं। यदि ऐसी योजनाओं के क्रियान्वयन में अनियमितता के आरोप सामने आते हैं और जांच के बाद भी कार्रवाई लंबित रहती है, तो यह न केवल योजना की विश्वसनीयता बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
=सचिव का बदला रुख
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए छत्तीसगढ़ श्रम विभाग के सचिव हिमशेखर गुप्ता ने प्रारंभिक स्तर पर इसे जिला प्रशासन से संबंधित विषय बताया था। हालांकि जब उन्हें अवगत कराया गया कि जिला प्रशासन पहले ही कार्रवाई की अनुशंसा करते हुए पत्र भेज चुका है, तब उन्होंने कहा कि जांच प्रतिवेदन के परीक्षण के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
=अब शासन के फैसले पर टिकी नजर
करीब डेढ़ माह से लंबित इस प्रकरण ने जिले में प्रशासनिक चर्चा को तेज कर दिया है। जांच रिपोर्ट, कार्रवाई की अनुशंसा और शासन स्तर पर फाइल पहुंचने के बावजूद निर्णय न होना कई सवाल खड़े कर रहा है। अब सबकी नजर शासन के अंतिम फैसले पर टिकी है कि क्या इस मामले में निलंबन, रिकवरी और एफआईआर जैसी अनुशंसित कार्रवाइयों पर अमल होगा या मामला लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया में उलझकर रह जाएगा।





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