छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरती हमेशा से ही कला, संगीत और नृत्य के लिए प्रसिद्ध रही है। यहां की परंपराएं केवल लोकगीतों और लोकनृत्यों तक सीमित नहीं, बल्कि शास्त्रीय कला विधाओं में भी यह राज्य एक समृद्ध इतिहास और गहरी पहचान रखता है। इसी सांस्कृतिक परंपरा को जीवित रखने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रतिवर्ष “पावस प्रसंग” उत्सव का आयोजन किया जाता है।
इस वर्ष भी “पावस प्रसंग” का आयोजन 2 से 6 सितंबर तक राजधानी रायपुर के मुक्ताशी मंच पर हो रहा है। यह आयोजन न केवल कला प्रेमियों के लिए एक अनोखा अवसर प्रदान करता है, बल्कि छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय स्तर पर शास्त्रीय कला के केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
*पावस प्रसंग: वर्षा और कला का अनूठा संगम*
“पावस प्रसंग” नाम ही इसकी आत्मा को दर्शाता है। वर्षा ऋतु का आगमन जब धरती को हरा-भरा बना देता है, प्रकृति की लय को और जीवंत कर देता है, तब उसी लयबद्धता को शास्त्रीय नृत्य और संगीत के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। यह उत्सव इस बात का प्रतीक है कि कला और प्रकृति का रिश्ता सदियों से कितना गहरा रहा है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य में “पावस” का विशेष महत्व है। राग मल्हार, मेघ मल्हार जैसे राग वर्षा ऋतु में गाए जाते हैं और मन को भिगोने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि पावस प्रसंग केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कला और प्रकृति का उत्सव है।
*कार्यक्रम का विशेष आकर्षण*
इस वर्ष के आयोजन में प्रतिदिन शास्त्रीय और उपशास्त्रीय कला विधाओं की प्रस्तुतियाँ होंगी। हर दिन अलग-अलग रंग और विविधता दर्शकों को अनुभव कराएगी।
2 सितम्बर – कत्थक एवं उपशास्त्रीय गायन
3 सितम्बर – कत्थक एवं शास्त्रीय गायन
4 सितम्बर – कत्थक एवं उपशास्त्रीय गायन
5 सितम्बर – कत्थक, भारत नाट्यम एवं छत्तीसगढ़ी भाषा में उपशास्त्रीय गायन
6 सितम्बर – कत्थक, भारत नाट्यम एवं शास्त्रीय गायन
कार्यक्रम के दूसरे दिन रायपुर की प्रख्यात कथक नृत्यांगना सुश्री आशना दिल्लीवार अपनी प्रस्तुति से मंच को आलोकित करेंगी। उनकी प्रस्तुति न केवल छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करेगी, बल्कि शास्त्रीय नृत्य की गहराई और भावपूर्ण अभिव्यक्ति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध भी करेगी।
*शास्त्रीय विधाओं की विविधता*
पावस प्रसंग में केवल एक ही नृत्य या संगीत शैली नहीं बल्कि अनेक शास्त्रीय विधाओं को शामिल किया जाता है।
1. कत्थक – उत्तर भारत की प्रमुख नृत्य शैली, जिसमें भाव, लय और ताल की अद्भुत प्रस्तुति होती है।
2. भारत नाट्यम – दक्षिण भारत की यह नृत्य शैली अपनी सजीव मुद्राओं और अभिव्यक्ति के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
3. शास्त्रीय गायन – भारतीय संगीत की आत्मा, जिसमें रागों की गहराई और सुरों की साधना झलकती है।
4. उपशास्त्रीय गायन – ठुमरी, दादरा, भजन और अन्य विधाएँ, जिनमें संगीत की मधुरता और भावों की कोमलता देखने को मिलती है।
विशेष बात यह है कि इस बार छत्तीसगढ़ी भाषा में भी उपशास्त्रीय गायन प्रस्तुत किया जाएगा, जो क्षेत्रीय संस्कृति और शास्त्रीय संगीत का अनोखा संगम होगा।
*कलाकारों और दर्शकों का संवाद*
इस प्रकार के आयोजनों का सबसे बड़ा उद्देश्य होता है कलाकार और दर्शक के बीच एक गहरा संवाद स्थापित करना। मंच पर जब कोई नृत्यांगना अपने भावों से कथा प्रस्तुत करती है या गायक किसी राग की गहराई में उतरता है, तो दर्शक भी उस भाव यात्रा का हिस्सा बन जाते हैं। यही संवाद कला की सबसे बड़ी शक्ति है।
*पावस प्रसंग का महत्व*
1. सांस्कृतिक संरक्षण – यह आयोजन युवा पीढ़ी को शास्त्रीय कला विधाओं से परिचित कराता है।
2. प्रेरणा का स्रोत – budding कलाकारों के लिए यह मंच प्रेरणा का स्रोत बनता है।
3. राष्ट्रीय पहचान – छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक मानचित्र में स्थापित करता है।
4. लोक और शास्त्र का संगम – लोक संस्कृति और शास्त्रीय विधाओं को एक साथ जोड़ने का प्रयास।
*कला और समाज*
कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण भी होती है। जब मंच पर नृत्य या संगीत प्रस्तुत होता है तो उसमें छिपे भाव हमारे समाज की संस्कृति, नैतिकता और जीवन मूल्यों को प्रकट करते हैं। पावस प्रसंग जैसे आयोजन हमें यह याद दिलाते हैं कि आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना कितना आवश्यक है।
*मायने*
“पावस प्रसंग” केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना का उत्सव है। 2 से 6 सितंबर तक रायपुर का मुक्ताशी मंच कला साधकों और कला प्रेमियों का मिलन स्थल बनेगा। शास्त्रीय और उपशास्त्रीय नृत्य-संगीत की यह श्रंखला न केवल दर्शकों के मन को भिगोएगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देगी कि वे अपनी धरोहर को पहचानें और उसका सम्मान करें।
यह उत्सव हमें यह सिखाता है कि जिस तरह वर्षा की बूंदें धरती को नया जीवन देती हैं, उसी तरह कला भी हमारे हृदय और समाज को जीवंत करती है।










Leave a Reply