एक तरफ मुझपर आस्था रखकर मेरी पूजा करते हो ,और दूसरी तरफ मुझे और मेरी मंदिर को तोड़ते हो- देवतागण

*एक तरफ मुझ पर आस्था रखकर मेरी पूजा करते हो और दूसरी तरफ मुझे और मेरे मंदिर को तोड़ते हो :: देवतागण*
*” खबरीलाल सुदीप्तो चटर्जी ” द्वारा – लेख, कटाक्ष, व्यंग।*
हे मनुष्य ! हे सनातन धर्मी ! मुझे विगत कुछ दिनों से इतनी पीड़ा हो रही है जिसे मैं सशरीर आपके पास आकर वर्णन नहीं कर सकता। अरबों की संख्या में हिन्दू सनातन धर्म मे आस्था, विश्वास रखने वाले आज इस कलयुग में , हे मनुष्य ! आप सभी को क्या हो गया है ? हम सभी देवताओं की नगरी, हमारे निवस्थान काशी में हमारे बाबा विश्वनाथ व माता पार्वती के सबसे प्रिय पुत्र गणेश जी की मूर्ति एवं मंदिर तोड़ दी गई और आप सब इस अमानवीय घटना को केवल देखकर अपने अंदर छुपा लिए । ये कैसा मनुष्यतत्व है ? क्या आप सभी के मन से हमारे प्रति आस्था, विश्वास, प्यार सब उठ गया है।
मैं सभी देवतागणों की तरफ से एक दूत बनकर आपसे प्रश्न कर रहा हूँ जिसका आप मुझे उत्तर दीजिये जिसे मैं अन्य देवताओं के पास आपकी वाणी को रख सकूँ। मुझे बड़ी पीड़ा हुई कि एक सन्यासी जिन्हें आप दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के नाम से जानते हो वे नंगे पांव चलकर , पदयात्रा कर हम सभी देवताओं से माफी मांगे की हम सन्यासी आपके लिए कुछ न कर सके लेकिन आप अपना कोप निरीह मनुष्य के ऊपर मत डालियेगा। उन्हें पाप मुक्त रखियेगा।
हम सभी देवताओं को उस वक्त और पीड़ा हुई जब इस भीषण गर्मी के दिनों में एक दंडी स्वामी तथा उनके अनुयायी नंगे पैर तप्ती धरती पर 90 किमी की पदयात्रा किये जो केवल हमारे मंदिरों और हमारे विग्रह को बचाने के लिए। भगवान ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर ने मुझे कहा देखो देवता, दंडी स्वामी के पैर में छाले पड़ गए हैं, खून बह रहा है और इसके पश्चात भी वे पदयात्रा कर मंदिरों को बचाने हेतु आन्दोलनम कर सोये हुए लोगों को जगा रहे हैं। आप मर्त लोक में संदेश भेजिए की दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। वे तो काशी के धरोहरों को बचाने, लोगों को जगाने और विकास के नाम पर विनाश को रोकने हेतु प्रयत्न कर रहे हैं। उन्हें किसी भी राजनेता से कोई दुश्मनी नहीं है उनका केवल इतना कहना है कि – खुद को हिन्दू बोल रहे हो फिर भी मंदिर तोड़ रहे हो। इस वाक्य को हे मनुष्य आप सभी को समझना होगा।
हम सभी देवता बहुत खुश हुए थे कि केंद्र तथा राज्य शासन में कुछ साधु, संत, साध्वी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं , हिन्दुतत्व की सरकार आई है, लेकिन वे भी राजनीति के रंग में रंगे हुए मिले। दूसरी बार खुशी हम देवताओं को तब हुई जब एक महंत सांसद से मुख्यमंत्री बना। उस वक़्त हम देवताओं की आस और बढ़ गई कि अब हमारे रामलला का भव्य मंदिर अयोध्या में निर्मित होंगे, लेकिन इस मामले में भी हम देवताओं को निराशा ही हाथ लगी साथ मे विकास के नाम पर हमारे पुराणों में वर्णित हमारे देवताओं के मंदिर ही तोड़ दिए गए और महंत जी कुछ बोल भी नहीं रहे हैं और जिन्होंने मंदिर तोड़ा उनके ऊपर भी कार्यवाही नहीं किये। हे पृथ्वी वासियों, हम सब देवतागण को इतनी पीड़ा हुई कि हम आपस मे रोकर एक दूसरे देवता को सांत्वना दे रहे हैं। आप जब अपने तकलीफों के समय, खुशियों के समय, चुनाव के समय हमारे पास आशीर्वाद लेने आते हो तो क्या हम आप सभी को आशीर्वाद नहीं देते हैं। हम देवतागण कोई भेदभाव नहीं करते। जो जैसा कर्म करता है वो वैसा ही भोगता है। जो अच्छा कार्य जनता के हित में, देश हित मे करते हैं उसे ही जनता जिताती है और उसे ही लोग सर आंखों पर बैठते हैं। ये तो आपका भाग्य और कर्म है कि आप कैसी छवि जनता, लोगों के बीच मे बनाते हो। इसमें हम देवताओं का क्या कसूर जो हमे ही पीड़ा पहुंचाया जा रहा है।
हम सभी देवताओं का विश्वास है कि देवताओं का देश, वेद पुराण पढ़ने वालों का देश, विविध संस्कारों का देश, विविध मान्यताओं वाला देश, धार्मिक लोगों का देश एक दिन जरूर जागेगा और हम देवताओं को अपमानित होने से बचायेगा। यही आशीर्वाद हम देवता आप सभी मर्त वासियों को करते हैं।